*जब देखा खुद को आइने में,* *थोड़ा घबरा गए थे हम ।* *और जब बन -ठन गए ,* *खुद ही इतरा गए थे हम ।* *चेहरे की त्वचा ,* *थोड़ी ढीली हुई तो क्या,* *उम्र भी थोड़ी बढ़ गई तो क्या,* *बाल सफ़ेद अब आने लगे हैं ।* *कलर है न, लगा के हम भी तो इतराने लगे हैं..।* *यह भी इक पड़ाव है जिंदगी का* *हम सब के मध्य आएगा।* *बचपन आया ,जवानी आई ,* *तो क्या बुढ़ापा न आएगा ?* *समय का बस आप मज़ा लीजिये,* *क्या कुछ छूटा परवाह न कीजिये।* *जो है बस उसे भर कर जिएं* *लुत्फ़ ज़िंदगी का उठा लीजिये।* *आधी से ज्यादा कट गई,* *न जाने कितने पल बचें है।* *यह सब सोचकर* *न घबराया कीजिये,* *जिंदगी है* *उसे जिंदगी की तरह जिया कीजिये....
जब देखा खुद को आइने में